नई दिल्ली: कुछ महीनों पहले आपने एक नारा जरूर सुना होगा. ये नारा था-छीन कर लेंगे आजादी. ये नारा लगाने वाले लोग, अपने ही देश से न जाने कौन सी आजादी लेना चाहते हैं, इन लोगों ने इस नारे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए किया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि छीन कर लेंगे आजादी की ये भावना कभी देश के लिए आजादी की मशाल बन गई थी और इस मशाल को जलाने वाले नेता का नाम था-नेता जी सुभाष चंद्र बोस. जिनका आज ही के दिन 18 अगस्त वर्ष 1945 में ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हो गया था. इसलिए आज नेता जी कहानी के जरिए छीन कर लेंगे आजादी की भावना को सही मायनों में समझने का दिन है.

भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस, की मृत्यु ताइवान में विमान दुर्घटना में हुई थी. लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है, इसको लेकर आज भी कई सवाल और शंकाएं हैं.

बोस के निधन की परिस्थितियों की जांच के लिए अब तक तीन जांच आयोगों का गठन
सुभाष चंद्र बोस के निधन की परिस्थितियों की जांच के लिए देश में अब तक तीन जांच आयोगों का गठन हो चुका है जिसमें से दो आयोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि नेताजी का निधन हवाई हादसे में 18 अगस्त 1945 को हुआ था, जबकि इसकी जांच करने के लिए बनाए गए अंतिम मुखर्जी आयोग का निष्कर्ष था कि जिस दिन ताइवान में नेताजी के विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की बात कही जाती है, उस दिन तो वहां कोई हादसा हुआ ही नहीं था. एक बड़ा तबका ये मानता है कि नेताजी ने विमान दुर्घटना की बात, दरअसल अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने के लिए की थी. लेकिन आज भी उनकी मौत का सच सामने नहीं आ पाया है.

अगर आप इस देश के बारे में सोचेंगे तो आपको ये एहसास भी होगा कि भारत के 135 करोड़ लोगों पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का एक कर्ज है, और वो कर्ज, दिल में देशभक्ति की भावना को भर के ही चुकाया जा सकता है. इसलिए आज हम नेताजी की मृत्यु के रहस्यों से पर्दा उठाएंगे.

अंग्रेजों को चकमा देने के लिए किया भेष बदलने की कला का इस्तेमाल 
आज की तारीख में हर हिन्दुस्तानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की नेतृत्व क्षमता और आजादी के संघर्ष में उनकी राष्ट्रवादी सोच से अच्छी तरह परिचित है. लेकिन आपको शायद इस बात की जानकारी नहीं होगी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कूटनीतिक चालें चलने में भी महारत हासिल थी. नेताजी ने कई बार भेष बदलने की कला का इस्तेमाल अंग्रेजों को चकमा देने के लिए किया था. 16 जनवरी 1941 को देर रात करीब 1 बजकर 35 मिनट पर कलकत्ता में एक ऐसा ही वाकया हुआ था, जिसे ‘The Great Escape’ कहते हैं. ये Great Escape 18 जनवरी 1941 को धनबाद के गोमो जंक्शन नामक रेलवे स्टेशन पर जाकर खत्म हुआ था. इस स्टेशन को अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस, गोमो रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है. इस घटना को विस्तार से समझाने के लिए मैं आपको 79 साल पुराने कुछ किस्से सुनाना चाहता हूं.

जुलाई 1940 में भारत की आज़ादी के संघर्ष के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अंग्रेजों ने कलकत्ता की जेल में बंद कर दिया था.

नेताजी को 26 जनवरी 1941 को ब्रिटिश कोर्ट के सामने पेश होना था. उस दौरान अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी के लिए नेताजी जर्मनी की मदद चाहते थे. लेकिन कोलकाता की जेल में रहकर ऐसा करना संभव नहीं था.

फिर नेताजी ने एक तरीका ढूंढा. उन्होंने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और मजबूरी में ब्रिटिश सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा. और 5 दिसम्बर 1940 को अंग्रेज़ों ने नेताजी को उन्हीं के घर में नजरबंद कर दिया था.

उस समय नेताजी के घर की निगरानी Bengal CID को सौंप दी गई थी. नेताजी पर नजर रखने के लिए अंग्रेज़ों ने उनके घर पर अपने Agents भेज दिए थे. यहां तक कि अंग्रेजों ने नेताजी के रिश्तेदारों से भी उनके बारे में जानकारियां इकट्ठा की थीं.

घर में नजरबंद नेताजी ने दाढ़ी रखनी शुरू कर दी, और बड़ी ही चालाकी से अपनी Forward Block Party के नेता मियां अकबर शाह को एक टेलीग्राम भेजा. मियां अकबर शाह उस समय North West Frontier Province में थे, जो आज की तारीख में पाकिस्तान में है.

नेताजी के बुलावे पर मियां अकबर शाह, पेशावर से कलकत्ता पहुंच गये और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर उन्होंने कलकत्ता से काबुल भागने का प्लान बनाया.

इस योजना को अंजाम देने के लिए नेताजी ने अपने भतीजे शिशिर से बात की और एक कार के जरिए धनबाद तक पहुंचने का प्लान बनाया गया. उस वक्त शिशिर की उम्र 20 साल थी और उन्होंने कभी कलकत्ता के बाहर गाड़ी नहीं चलाई थी. लेकिन नेताजी ने शिशिर पर भरोसा किया और वो अंग्रेजों की नज़रों से बचकर किसी तरह धनबाद पहुंच गए. इसके बाद नेताजी ने काली शेरवानी पहनकर एक मुस्लिम इंश्योरेंस एजेंट का रूप धारण किया और अपना नाम जियाउद्दीन रख लिया था.

कलकत्ता में अपने घर से काबुल तक पहुंचने के नेता जी के इस प्लान को ‘The Great Escape’ कहा जाता है. लेकिन इसके बारे में देश के लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है. क्योंकि, हमारे देश की मीडिया से लेकर पाठ्यपुस्तकों तक में, एक खास परिवार का ही गुणगान किया जाता रहा है. लेकिन आज से आप इसमें बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं. वर्ष 2013 में मैंने नेताजी की पुत्री अनीता बोस का एक इंटरव्यू किया था. इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने पिता के बारे में कई ऐसी बातें बताई थीं जिसकी जानकारी शायद आपको भी न हो.

नेता जी के जीवन से ये बातें सीख सकते हैं
अब आपको ये जानना चाहिए कि आप नेता जी के जीवन से क्या सीख सकते हैं. वो पहले नेता थे जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए देश से बाहर जाकर एक सेना यानी आजाद हिंद फौज बनाई थी. उन्होंने भारत के लोगों और खासकर युवाओं को देश की आजादी के लिए लड़ना सिखाया था और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा दिया. 

उन्होंने जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन और इटली समेत दुनिया के 9 देशों को भारत की आजादी के पक्ष में ले आए थे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद भारत का पहला तिरंगा झंडा, अंडमान निकोबार में फहराया था.

6 जुलाई 1944 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद रेडियो से नेताजी ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था. ये पहली बार था, जब किसी ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी.

वर्ष 1939 में गांधी जी की इच्छा का सम्मान करते हुए सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था.

सुभाष चंद्र बोस अपने जीते जी देश को आजाद कराना चाहते थे. लेकिन नेता जी का आजाद भारत वाला सपना अधूरा रह गया था क्योंकि, 18 अगस्त 1945 को नेताजी जब सोवियत संघ जा रहे थे तभी ताइवान में उनका विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया. इस हादसे में नेताजी की मृत्यु हुई या नहीं इस पर कई शंकाएं जताई जाती हैं लेकिन अफसोस की बात ये है कि आज भी उनकी मौत का सच सामने नहीं आ पाया.

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