नई दिल्ली: क्या हमारे सिस्टम ने महिलाओं को न्याय देने के लिए दो शर्तें निर्धारित कर दी हैं? पहली शर्त ये कि महिला के साथ दरिंदगी के साथ गैंगरेप हो और दूसरी शर्त ये कि महिला की मौत हो जाए. 8 साल पहले जब निर्भया के साथ ऐसा हुआ था, तब ऐसा लगा था कि पूरा देश जाग गया है. उस मामले में निर्भया के साथ गैंगरेप हुआ और फिर उसकी मौत हो गई. हैदराबाद में भी ठीक ऐसा ही हुआ था और हाथरस में जो हुआ उसमें भी एक महिला को न्याय दिलाने की मुहिम तब शुरू हुई जब गंभीर चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई.

महिलाओं के प्रति हमारे समाज की सोच बेपर्दा हो गई
इस पूरे मामले को कुछ लोग इस बहस में उलझा रहे हैं कि हाथरस की 18 साल की इस लड़की के साथ गैंगरेप हुआ था या नहीं? जबकि बहस इस बात पर होनी चाहिए कि हमारे देश में किसी भी बेटी को न्याय पाने के लिए पहले मरना क्यों पड़ता है. इस हत्याकांड ने एक बार फिर महिलाओं के प्रति हमारे समाज की सोच को बेपर्दा कर दिया है. हाथरस की 18 साल की एक बेटी के साथ एक खेत में हिंसा की जाती है. उसे इतनी बेरहमी से मारा पीटा जाता है कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाती है और फिर जब उसकी मौत हो जाती है तो उसके अंतिम संस्कार वाले अधिकार के साथ भी अन्याय किया जाता है. खेत में हिंसा का शिकार हुई लड़की के शव को एक खेत में ही जला दिया जाता है और इसके लिए रात के ढाई बजे का समय चुना जाता है. 

जिन खेत खलिहानों में इस लड़की का बचपन बीता आज वहीं पर इसी चिता जल रही है. हाथरस की इस बेटी का अंतिम संस्कार रात के अंधेरे में शमशान की बजाय इस खेत में कर दिया गया. अब आप सोचिए जिस देश में खेतों में बेटियों की चिता जलने लगे उस देश का भविष्य क्या होगा?

किसी भी मृत व्यक्ति को जो सबसे अंतिम अधिकार हासिल होता है वो ये है कि उसका अंतिम संस्कार सम्मानजनक तरीके से किया जाए. लेकिन हाथरस में जो हुआ उसके केंद्र में सिर्फ एक लड़की की दर्दनाक मौत नहीं है, बल्कि इस घटना ने हमारे सिस्टम को भी नैतिक तौर पर मृत साबित कर दिया है.

एसआईटी जांच के आदेश
आरोप है कि हाथरस की पुलिस ने 29 सितंबर की रात ढाई बजे लड़की के परिवार की इजाजत के बगैर गांव के एक खेत में उसका अंतिम संस्कार कर दिया. इस घटना के बाद लोगों का गुस्सा और भड़क गया. आज देश भर में कई शहरों में इस घटना को लेकर विरोध प्रदर्शन किए गए. लेकिन सबसे बड़ा अपडेट ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस घटना का संज्ञान लिया है. उन्होंने इस बारे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से फोन पर बात की और कहा कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए. इसकी जानकारी खुद योगी आदित्यनाथ ने एक ट्वीट करके दी है. अब इस घटना की जांच करने के लिए बड़े अधिकारियों के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल का का गठन कर दिया है. इस टीम में उत्तर प्रदेश के गृह सचिव, उत्तर प्रदेश के डीआईजी और एक महिला आईपीएस अधिकारी शामिल हैं.

अंतिम संस्कार के अधिकार से भी अन्याय
उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन भले ही घटना के 17 दिनों के बाद एक्शन में आया हो. लेकिन कल रात इस लड़की के गांव में इसके अंतिम संस्कार को लेकर जो कुछ हुआ. उसकी तस्वीरें आपको हैरान कर देंगी. 14 सितंबर को हाथरस के जिस गांव में ये घटना हुई थी उसका नाम है भूलगढ़ी. घटना के बाद इस लड़की को पहले हाथरस के एक स्थानीय अस्पताल और फिर अलीगढ़ के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन जब इसकी हालत बिगड़ने लगी तो इसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया. जहां 29 सितंबर की सुबह इसकी मौत हो गई. इसके बाद इस लड़की के शव का पोस्टमार्टम किया गया. कल देर रात उत्तर प्रदेश पुलिस और अधिकारियों की एक टीम इस लड़की का शव लेकर इसी गांव में पहुंची. लेकिन इस पूरे मामले ने तूल तब पकड़ा जब पुलिस इस लड़की का शव उसके घर लेकर नहीं पहुंची. इसके बाद लड़की के परिवार और गांव वालों ने विरोध शुरू कर दिया.

इस दौरान लड़की का परिवार पुलिस अधिकारियों से विनती करता रहा कि लड़की का शव उन्हें सौंप दिया जाए. ये सब इसलिए हो रहा था क्योंकि गांव वालों को शक हो गया था कि पुलिस शव को लड़की के घर ले जाने की बजाय, कहीं और ले जा रही है.

इसके बाद पुलिस का एक अधिकारी भीड़ को समझाता है कि लड़की का अंतिम संस्कार अभी करने दिया जाए. लेकिन लड़की का परिवार और रिश्तेदार इसके लिए तैयार नहीं होते.

यानी कुल मिलाकर पुलिस ये चाहती थी कि अंतिम संस्कार रात में ही हो जाए जबकि लड़की का परिवार चाहता था कि अंतिम संस्कार सूर्योदय के बाद किया जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू संस्कृति में किसी भी मृतक का अंतिम संस्कार सूर्यास्त के बाद नहीं किया जाता है.

जब गांव वाले पुलिस अधिकारियों को कहते हैं कि अंतिम संस्कार रात में नहीं किया जाता है तो एक पुलिस अधिकारी कहता है कि ऐसा कहीं नहीं लिखा है. गांव वालों को समझाने के लिए हाथरस के DM भी मौके पर पहुंचे थे. उन्होंने जो दलील दी वो आपको और भी हैरान कर देगी. उन्होंने कहा कि वो राजस्थान से हैं और उनके यहां अगर अंतिम संस्कार जल्दी नहीं किया जाता तो आत्मा भटकने लगती है.

पुलिस झूठ बोल रही है?
कई घंटों तक चले इस हंगामे के बावजूद पुलिस अधिकारी नहीं माने. रात ढाई बजे गांव के ही एक खेत में इस बेटी के शव को जला दिया गया. जब इस लड़की के शव को जलाया जा रहा था. पुलिस का दावा है कि इस अंतिम संस्कार में लड़की के कुछ घरवाले भी मौजूद थे. लेकिन लड़की के परिवार का दावा है कि पुलिस ने उन्हें आधा किलोमीटर पहले ही रोक लिया था और पुलिस झूठ बोल रही है.

हाथरस का पूरा सच
जिस दिन इस लड़की के साथ ये हिंसा हुई थी. घटना के बाद लड़की का भाई उसे मोटरसाइकिल पर बिठाकर पुलिस थाने पहुंचा. जहां उसे जमीन पर बने एक चबूतरे पर लिटा दिया गया. ये 14 सितंबर की घटना है. यहां पुलिस वाले लड़की का बयान दर्ज करने के ​साथ उसका वीडियो बना रहे थे. एक लड़की दर्द से तड़प रही थी. लेकिन आसपास खड़े पुलिस वाले आराम से वीडियो बना रहे थे यानी किसी ने भी इसे पहले अस्पताल पहुंचाने की कोशिश नहीं की. लड़की के भाई का तो ये भी आरोप है कि पुलिस वालों ने इसे अस्पताल पहुंचाने तक से मना कर दिया. बाद में लड़की का भाई अपनी बहन को एक ऑटो में बिठाकर अस्पताल ले गया.

जब इस लड़की को एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया. उस दिन का भी एक वीडियो सामने आया है. हालांकि ये वीडियो किस तारीख का है इसकी हम पुष्टि नहीं कर सकते. लेकिन वीडियो देखकर लगता है कि ये वीडियो भी घटना वाले दिन का ही है. इस वीडियो में ये लड़की बता रही है उसके साथ 14 तारीख को क्या हुआ था.

इसके बाद इस लड़की की मां भी इस घटना के बारे में बताती हैं. जिस दिन लड़की के साथ ये हिंसा हुई उस दिन वो अपनी मां के साथ ही खेत में घास काटने गई थी. 

अपने पहले बयान में लड़की और उसकी मां दोनों ने ही गैंगरेप का जिक्र नहीं किया है. लेकिन इसमें संदीप और रवि नाम के दो लड़कों का नाम लिया जा रहा है. पुलिस संदीप और रवि के समेत 4 लोगों को हत्या और गैंगरेप के आरोप में गिरफ्तार कर चुकी है. 

इसके बाद लड़की की हालत में जब कोई सुधार नहीं आया तो उसे अलीगढ़ के एक अस्पताल में रेफर कर दिया गया. यहां लड़की ने साफ साफ बताया कि उसके साथ उस दिन रेप किया गया था. लड़की के इसी बयान के बाद पुलिस ने एफआईआर में गैंगरेप की धारा जोड़ी थी. 

जब हमारी टीम इस लड़की के गांव पहुंची तो वहां हमारी बात लड़की के भाई से हुई. उन्होंने हमें बताया कि उनकी बहन पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए जब किसी पुलिस अधिकारी ने उससे पूछा कि क्या तुम्हारे साथ रेप हुआ है तो ये समझ नहीं पाई और इनकार कर दिया. लेकिन अगले दिन जब किसी बड़े पुलिस अधिकारी ने इससे पूछा कि क्या तुम्हारे साथ कुछ गलत हुआ है तो इसने हां में जवाब दिया.

हालांकि अलीगढ़ के जिस जेएन मे​डिकल कॉलेज में इस लड़की की मेडिकल जांच की गई उसकी मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हो पाई है. ये लड़की 22 सितंबर तक इसी अस्पताल में भर्ती थी. हालांकि इस रिपोर्ट में ये जरूर लिखा गया है कि इस लड़की के साथ जबरदस्ती की गई थी और दुपट्टे से लड़की का गला दबाया गया था जिससे लड़की की रीढ़ की हड्डी टूट गई और उसे लकवा मार गया.

औपचारिक बयान दर्ज ही नहीं किया गया
रिपोर्ट के मुताबिक लड़की की पीठ पर खरोंचों के निशान भी थे लेकिन किसी तरह की अंदरूनी चोट की बात इस रिपोर्ट में नहीं लिखा है. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि रेप की पुष्टि फॉरेंसिक जांच के बाद ही हो सकती है. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि लड़की की हालत गंभीर है और जल्द से जल्द इसका मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराया जाना चाहिए. यानी 14 से 22 सितंबर तक इस ल़ड़की का औपचारिक बयान दर्ज ही नहीं किया गया. कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि जिस दिन लड़की ने वीडियो में रेप की बात मानी उस दिन तक लड़की की स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी और उसका बचना मुश्किल लग रहा था. इस हिंसा की वजह इस लड़की के पूरे शरीर को लकवा मार गया था. इसकी पुष्टि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ने भी की है.

बावजूद इसके इस मामले में अभी कई सवालों का जवाब बाकी है.

इस 18 साल की लड़की की हत्या तो 4 लड़कों ने की लेकिन इसकी आत्मा को मारने का काम हमारे सिस्टम और समाज ने किया.

बेटियों के प्रति हमारे समाज की सोच
किसी ने कभी लिखा था कि बोए जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियां, खाद पानी बेटों में, लहलहाती हैं बेटियां. लेकिन ये वो बेटियां होती हैं जो खुशकिस्मत होती हैं. वरना अक्सर हिंसा की आग में जलते हैं बेटे और राख बन जाती हैं बेटियां. ठीक वैसे ही जैसे हाथरस की ये लड़की अब महज राख बनकर रह गई है. लेकिन ये राख इस बात की गवाह है कि बेटियों के प्रति हमारे समाज की सोच कितनी ठंडी हो चुकी है.

शरीर मिट्टी है और इसे एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है. लेकिन अगर इस मिट्टी पर कोई हिंसा का तेजाब डाल दे तो वो बंजर हो जाती है और बंजर जमीनों और बंजर जमीरों के सहारे कोई समाज तरक्की का रास्ता नहीं पकड़ सकता. एक भाई अपनी बहन को अधमरी हालत में लेकर पहले पुलिस के पास जाता है. लड़की की गर्दन टूटी हुई लेकिन पुलिस की गर्दन वर्दी के अहंकार में अकड़ी हुई है. न नुकुर के बाद रिपोर्ट लिखी तो जाती है. लेकिन दम तोड़ती लडकी की लड़खड़ाती जुबान से निकले सच को दुतकार कर अस्पताल रवाना कर दिया जाता है.

खेत में दबंगों ने इस लड़की के सिर्फ शरीर को ही चोट नहीं पहुंचाई बल्कि इसकी आत्मा को भी जख्मी कर दिया.

हमारा सड़ चुका सिस्टम भी आखिरी सांसे ले रहा…
16 दिनों तक सिर्फ हाथरस की ये 18 साल की बेटी ही वेंटिलेटर पर नहीं थी, बल्कि हमारा सड़ चुका सिस्टम भी आखिरी सांसे ले रहा था. लड़की की मौत तो 29 सितंबर को हुई. लेकिन हमारा सिस्टम उसके मरने के बाद भी उसके साथ अन्याय करता रहा.

डीएम साबह को आत्मा के भटकने का डर सता रहा था लेकिन डीएम साहब आप उस सिस्टम और समाज का क्या करेंगे. जिसका शरीर तो जिंदा है. लेकिन आत्मा कब की मर चुकी है. दाह संस्कार करना ही है तो उन बड़े बड़े दावों का भी कर दीजिए जिनसे बेटियों को उज्जवल भविष्य का सपना दिखाया जाता है. लेकिन हकीकत में उनके शरीर को रात के अंधेरे में जला दिया जाता है.

यूं तो हर मां बाप का सपना होता है कि वो तारों की छांव में अपनी बेटियों को हंसते खेलते विदा करें. लेकिन आधी रात को जब सिस्टम सच पर पर्दा डालने का फैसला कर लेता है तो सच राख बनकर जमीन पर बिखर जाता है और इस राख की गर्माइश चीख चीखकर कहती है कि अगले जन्म मोहे बिटिया ना की जो.

जिनसे कहा जाता है कि बेटी दुपट्टा ओढ़कर बाहर जाओ, उन बेटियों की गर्दन उसी दुपट्टे में उलझाकर तोड़ दी जाती है. जुबान को लहू लुहान कर दिया जाता है और बहस इस पर शुरू हो जाती है कि बताओ बलात्कार हुआ था या नहीं यानी अगर बलात्कार होगा, फिर मौत होगी, तभी चिता मशाल बनेगी और अगर ऐसा नहीं होगा तो बेटियां मरती रहेंगी क्योंकि बेटियों का क्या है ? कभी उन्हें पेट में मार दिया जाता है, कभी पैदा होने के बाद उनके अरमानों का गला घोंट दिया जाता है और अगर वो लड़े संघर्ष करें तो उसकी उसी खेत में हत्या कर दी जाती है, जहां उसने फसलों को काटते हुए अपने सुनहरे भविष्य के बीज बोए थे.

मौत पर राजनीति
दूसरी तरफ हाथरस की बेटी को ​इंसाफ मिले न मिले इस मामले में राजनीति शुरू हो गई हैं. 29 सितंबर की रात को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में जब लड़की का पार्थिव शरीर ले जाने की प्रक्रिया चल रही थी. तब लड़की के पिता और भाई अस्पताल के गेट पर ही मौजूद थे. वहां भीम आर्मी के चन्द्रशेखर और कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता जमा थे. तभी वहां आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज भी पहुंच गए. उसके बाद अस्पताल के गेट पर जो तमाशा हुआ उसे देखकर आप समझ जाएंगे कि वहां मौजूद किसी भी नेता को न तो परिवार के दुख दर्द से सरोकार था, न लड़की को इंसाफ दिलाने की चिंता.

आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज सफदरजंग अस्पताल के गेट पर मौजूद दिल्ली पुलिस से बहस करते हैं, पुलिस के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं. जब दिल्ली पुलिस इस पर आपत्ति जताती है तो वो ये भी याद दिलाते हैं कि मैं एरिया का MLA हूं इसलिए मुझे सर कहकर संबोधित किया जाए.

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